गुरुवार, 26 मार्च 2009
सूरजकुंड मेले में स्वच्छता का रखा गया है ध्यान भी़ड़ की आपाधापी में हर इंसान को हमेशा जो एक चीज खटकती है, वो है साफ-सफाई का अभाव। भीड़ का रेला जो थमता नहीं दिखता, वो कहीं भी कोई भी आयोजन हो, ऐसा लगता है सारी सुविधाओ के बाद भी काई चीज अधुरी रह गई है। इन सब बातों को यदि सूरजकुंड मेला से जोड़ कर देखें तो यहां बात बिल्कुल उलट जाएगी। हरियाणा राज्य में 15 दिनों से चल रहे इस मेले में हर रोज करीब 50 हजार की संख्या में लोग आ रहे हैं। मेले की प्रसिद्दि का अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि इस वर्ष से दक्षिण एशियाई क्षेत्रिय राष्ट्र जैसे अफगानिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, थाईलैंड जैसे राष्ट्र शिरकत कर रहे हैं। साथ ही भारत के अधिकांश राज्यों से कई कारीगर इसमें अपनी कला का प्रर्दशन कर रहे हैं। कहीे लोकनृत्य है, तो कहीे प्राचीन कला कठपुतली का नृत्य, कहीे आदिवासी राज्य क्षेत्र के लोग बड़चढ़ कर अपना योगदान दे रहे हंै। मध्यप्रदेश, तमिलनाडु, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार आदि अन्य राज्यों से कुशल हस्तशिल्पी इस मेले में ‘ाामिल हुए हैं। निश्चित रुप से कला का यह मेला संगम स्थल बना हुआ है और लोगों के आर्कषण का केन्द्र भी। मगर सिक्के का दूसरा पहलू भी होता है। इस अदभुत साम´जस्य के पीछे योग्य प्रबंधन का। साथ ही इस प्रबंधन में सबसे ज्यादा ध्यान देने वाला क्षेत्र है, पूरे मेला परिसर की साफ-सफाई इस लिहाज जहां तक हमने देखा, सभी जगह साफ-सफाई का भरपूर ध्यान रखा जा रहा था। जहां हर रोज 50,000 की संख्या में लोग आ रहे हैं, वहां इतनी सफाई बरकरार रखना सही मायने में चुनौतीपूर्ण है। लेकिन मेला प्रबंधकों ने इस पर खास ध्यान रखा था। सभी जगह कू़ड़ेदान रखे थे, इसके अलावा हर थोड़ी दूर पर सफाई कर्मचारी अपना योगदान दे रहे थे। खाने-पीने वाले स्टॉलों के आस-पास अधिक ध्यान रखा गया था। साफ-सफाई के मामलों में ‘ाौचालयों की चर्चा भी जरुरी है। इनमें बाहरी दीवारों पर ग्रामीण झलक दिखाने के लिए आर्कषक ढंग से लिपाई-पुताई की गई थी और रंगों से सजाया गया था। मेला परिसर में इतनी भारी संख्या में लोगों का आना-जाना अनवरत जारी था और मेला आयोजकों ने भी साफ-सफाई को लेकर चैकस प्रबंध कर रखा था।
सूरजकुंड मेला : हस्तशिल्पियों के १५ दिनों का आशियाना
“ हम तो यहां 22-23 साल से आ रहें हैं। हमारा स्वंय सहायता समूह चलता है। इस समूह के लोग इस कार्य में लगे हैं। ये कला हमारी विरासत है। ” हरियाणा के भवणा गॉंव से आई फूलवंती मेले में काफी वर्षों से शिरकत करती आ रहीं हैं। वो अपने अनुभव बताते हुए कहतीं हैंः- ” इस मेले के आयोजक हम सबको काफी सुविधाएं मुहैय्या कराते हैं। हमारे रहने, खाने-पीने का पूरा प्रबंध सरकार करती है। स्थानीय भाषा में हमारी इस कला को टेरा-कोटा का सामान कहा जाता हैै। इसे हम अलग-अलग मिट्टी की किस्मों से बनाते हैं। इसके लिए 3-4 प्रकार जैसे काली, लाल और मुल्तानी मिट्टी को अच्छी तरह मिला कर बड़ी सी भट्टी में पकाया जाता है, उसके बाद उसे आॅयल पेंट से रंगा जाता है। ” हमारे सामने एक से एक खुबसूरत फ्लॉवर पॉट, पेन स्टैंड और अन्य सजाने योग्य वस्तुओं का भंडार लगा हुआ था। उनसे इन वस्तुओं से होने वाली कमाई के बारे में पूछने पर पता चला कि 200 रुपयों से शुरु होकर करीब 8000 रुपयों की कमाई उनकी हो जाती है। इन शिल्पों को देखकर इस के लिए काम करने वाले लोगों की कार्यकुशलता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। सूरजकुंड मेले में इस वर्ष मध्यप्रदेश को आधार राज्य विशेष बनाया गया था, इस कारण पूरे मेले में इसकी स्पष्ट छाप दिखाई पड़ती थी। मेले को यदि गौर से देखा जाए तो इसमें हस्तशिल्पियों की भरमार थी। कहीं लकड़ी पर अदभुत कारीगरी थी, तो कहीं मेटल पर हाथ की सफाई स्पष्ट झलकती थी। इसी समय हमारी नजर एक स्टॅाल पर पड़ी, जहां स्लेटी रंग लिए आर्कषक सजावटी सामान बिक रहे थे। पूछने पर उन्होनें बताया कि वो ग्वालियर, मध्यप्रदेश के हैं और इस मेले में चार बार ‘ाामिल हो चुके हैं। आगे उन्होनें बताया कि इस काम में उनके साथ आठ लोग सहायता करते हैं, जिनमें चार लोग उनके परिवार के ही ‘ाामिल है। रद्दी अखबारों और कागजों की लुग्दी बनाकर उसे फेविकोल की सहायता से चीनी मिðी और मुल्तानी मिðी के मिश्रित ढंाचे, जिसे डाई कहा जाता है, उसपर ढालते हैं और फिर पकाते हैं। पकने के बाद हमारे सामने ये खुबसूरत चीजें निखर कर सामने आ पाती हैं। मेले में आने के करीब चार-पॉंच महीने पहले ही ये लोग इन चीजों को बनाने में लग जाते हैं और मेले 50 रुपए से लेकर 10,000 रुपए तक की कमाई हो जाती है। इन्होनें बताया कि वे पहले दिए आॅर्डर पर भी सामान बनाकर लाते हैं। आमतौर पर इन बहुमुल्य सामाग्रियों की सही कीमत नहीं मिल पाती। इस कारण यह मेला निश्चित रुप से उन्हें एक बड़ा बाजार देता है, जहां देश-विदेश से आए सैलानी इनकी मेहनत को सही ढंग से आॅंकते हैं और मुॅंहमंागे दाम पर खरीदने को तैयार रहते हैं। हस्तशिल्प उद्योग को साथर्क रुप से बढ़ावा देने में इस मेले का निश्चित रुप से योगदान है। हस्तशिल्प वस्तुओं की कड़ी में ही आगे आकर्षक ऊनी दरियों की स्टॉल दिखी, जिसे जबलपुर, मध्यप्रदेश के एक गॉंव से मोहम्मद ‘ामीम ने खोल रखा था। उन्होनें हमें बताया कि करीब 5 वर्षों से वो यहां आ रहे हैं। हाथ से बनाई गई दरियों के बारे में उनका कहना था कि वो इसे तानी की सहायता से बनाते हैं। करीब दो-ढ़ाई लाख का इस्टीमेट लेकर वो यहां आते हैं, लौटने पर उन्हे एक-डेढ़ लाख की कीमत मिल ही जाती है। 3000 से ‘ाुरु हुई दरियों की कीमत 10,000 रुपए तक भी होती है। इस वर्ष मेले में हस्तशिल्प वस्तुओं के स्टालों में लकड़ी, मिटटी से बनी चीजें बड़े ही खुबसूरत ढंग से बनाई गई थी। किसी स्टॉल पर कागज पर डिजाइन कर उसे लकड़ी पर अपने हाथों की कार्यकुशलता से भगवान गणेश, और मॉं दुर्गा आदि की छोटी-बड़ी मुर्तियां बनाकर आर्कषक रंगों से रंगा जा रहा था। मेले को घूमने के बाद ऐसा लग रहा था जैसे स्टालों में रखी चीजें कोई भी पहले से बनी हुई नहीं बल्कि जीवंत हों। कारीगर उन्हें बनाने में मशगुल थे। उनकी योग्यता, लगन, परिश्रम और कार्यक्षमता का ही परिणाम था कि आप जिधर नजरें घुमाएं आपको इंसान के हुनर की खुबसूरती का सच्चा प्रमाण मिलता है। वर्षों से सहेजी गई इस कला को उसकी सही कीमत दिलाने के लिए भारत सरकार और हरियाणा सरकार के संयुक्त प्रयास से इस सूरजकुंड मेले का आयोजन, इन हस्तशिल्पियों के अनुसार, निश्चित रुप से प्रशंसनीय और सराहनीय है।
शनिवार, 21 मार्च 2009
ginti
gगिनती जो थमती नहीं, सच्चाई जो छिपती नहीं
भारत की नारी की दशा और दिशा को स्पष्ट करने का प्रयास आज भी हमारे समाज में जारी है। भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में नारी ‘ाब्द को आज दो भिन्न अर्थों में देखा जाने लगा है, एक अर्थ समाज के सामने प्रत्यक्ष है, यह सकारात्मक मायने में प्रयोग होता है, जाहिर है अच्छी बातें सभी पसंद करते हैं। वहीे दूसरा अर्थ न जाने क्यों अप्रत्यक्ष होते हुए भी जगजाहिर हो ही जाता हैं। प्रगतिशील नारी, सुनने में कितना अच्छा लगता है, एक ऐसे वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही है, जिसे पौरुष मानसिकता के तले दबाए जाने का हरसंभव प्रयास अभी तक जारी है। सभ्य समाज की मुरीद कुछ परिवार आज भी लड़कियों को प्रगतिशील और आधुनिक बनाने में मदद करने का दावा करते हैं, मगर वास्तविकता की भी झलक मिल रही है। नारी सशक्तिकरण का पलड़ा कितना भारी है, इसकी वास्तविकता से कोई ‘ाायद ही अंजान हो। देश में प्रगतिशील महिलाओं की गिनती भी कोई कम नहीं है। जब से स्त्रियों ने अपनी पहचान बनानी ‘ाुरु की, आज से इक्का-दुक्का से बढ़कर निश्चित रुप से सैकड़ों मंे पंहुच गई है। प्रख्यात महिलाएं, जिन्होनें देश में चिभिन्न क्षेत्रों के उच्चस्थ पदों पर पदास्थापित होकर लोकप्रियता हासिल कीें है, वो देश की राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर एक कम उम्र की अभिनेत्री और ऐसे ही असंख्य क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है। यहां तक कि भारत सरकार ने सन्् 2001 को नारी सशक्तिकरण वर्ष मनाए जाने की घोषणा कर डाली, और कहा गया कि- देश के नई शताब्दी में प्रवेश करने हुए हमारा लक्ष्य देश में नारियों को पुरुषों के समान स्थान देने का है। उस वर्ष कई परियोजनाएं लागू की गईं, कुछ महिलाओं को इससे लाभ भी मिला जैसे्’ स्वशक्ति और स्त्री -शक्ति और लघु इकाई के कार्यक्रम स्वयं्िसद्दा‘ की मदद से 100,000 महिलाओं को लाभ पहुंचााने वाले कार्यक्रम। इसके अतिरिक्त बालिकाओं के लिए बालिका सम्ृद्दि योजना‘ घोष्णा कर देना या उसके पहले और बाद किए गए घेाषणाओं ने इसके लक्ष्य को पूरा कर दिया है? इस विषय पर सोचने की फिर से जरुरत है।
1. कन्या-भ्रुण हत्या 2. कुछ वर्गोे में स्त्री शिक्षा आज भी नगण्य3. कम उम्र में विवाह 4. दहेज संबंधी प्रताड़ना और हत्याएं5. कामकाजी महिलाओं के साथ अनुचित व्यवहार 6. राजनीतिक अस्तित्व भी नगण्य 7. विधवाओं की दयनीय स्थिति 8. महिलाओं के साथ आपराधिक व्यवहार9. लड़कियों के साथ भेदभाव
ये समस्याएं आज भी मुंह बाये समाज के सामने खड़ी हैं। मात्र देश की 5 से 10 प्रतिशत प्रगतिशील महिलाएं बाकी 85 प्रतिशत महिलाओं का सही प्रतिनिधित्व नहीं कर रही है। हॉं अगर वे चाहें तो इस क्षेत्र में साथर्क पहल जरुर कर सकती है। समाज विकास की अवस्था से गुजरता हुआ आज इस स्थिति तक पहॅंुचा है। इसमें महिलाओं की वत्र्तमान स्थिति तक पहॅुंचा है। इसमें महिलाओं की वत्र्तमान स्थिति में अपने मुकाम हासिल करने के पीछे उनकी निरंतर संघर्ष करने की मानसिकता रही है। उसी सोच को बनाए रखने से ही आगे कुछ दशकों में हमारे देश में स्त्रियों की स्थिति में सुधार की संभावना है। देश के हर तबके में स्त्रियों को सही प्रतिनिधित्व और उचित मार्गदर्शन मिले तभी हमारा लक्ष्य कि स्त्रियां पुरुषों के समान खड़ी मिले, पूरा हो पाएगा। साथ ही लड़कियों में इतने आत्मबल की जरुरत है, जिससे वो अपने जीवन के लक्ष्य को पूरा करने में किसी विवशता के कारण कुंठित न रह जाए। बल्कि तमाम झंझावातों को सहते हुए उस लक्ष्य को पा सके।
भारत की नारी की दशा और दिशा को स्पष्ट करने का प्रयास आज भी हमारे समाज में जारी है। भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में नारी ‘ाब्द को आज दो भिन्न अर्थों में देखा जाने लगा है, एक अर्थ समाज के सामने प्रत्यक्ष है, यह सकारात्मक मायने में प्रयोग होता है, जाहिर है अच्छी बातें सभी पसंद करते हैं। वहीे दूसरा अर्थ न जाने क्यों अप्रत्यक्ष होते हुए भी जगजाहिर हो ही जाता हैं। प्रगतिशील नारी, सुनने में कितना अच्छा लगता है, एक ऐसे वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही है, जिसे पौरुष मानसिकता के तले दबाए जाने का हरसंभव प्रयास अभी तक जारी है। सभ्य समाज की मुरीद कुछ परिवार आज भी लड़कियों को प्रगतिशील और आधुनिक बनाने में मदद करने का दावा करते हैं, मगर वास्तविकता की भी झलक मिल रही है। नारी सशक्तिकरण का पलड़ा कितना भारी है, इसकी वास्तविकता से कोई ‘ाायद ही अंजान हो। देश में प्रगतिशील महिलाओं की गिनती भी कोई कम नहीं है। जब से स्त्रियों ने अपनी पहचान बनानी ‘ाुरु की, आज से इक्का-दुक्का से बढ़कर निश्चित रुप से सैकड़ों मंे पंहुच गई है। प्रख्यात महिलाएं, जिन्होनें देश में चिभिन्न क्षेत्रों के उच्चस्थ पदों पर पदास्थापित होकर लोकप्रियता हासिल कीें है, वो देश की राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर एक कम उम्र की अभिनेत्री और ऐसे ही असंख्य क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है। यहां तक कि भारत सरकार ने सन्् 2001 को नारी सशक्तिकरण वर्ष मनाए जाने की घोषणा कर डाली, और कहा गया कि- देश के नई शताब्दी में प्रवेश करने हुए हमारा लक्ष्य देश में नारियों को पुरुषों के समान स्थान देने का है। उस वर्ष कई परियोजनाएं लागू की गईं, कुछ महिलाओं को इससे लाभ भी मिला जैसे्’ स्वशक्ति और स्त्री -शक्ति और लघु इकाई के कार्यक्रम स्वयं्िसद्दा‘ की मदद से 100,000 महिलाओं को लाभ पहुंचााने वाले कार्यक्रम। इसके अतिरिक्त बालिकाओं के लिए बालिका सम्ृद्दि योजना‘ घोष्णा कर देना या उसके पहले और बाद किए गए घेाषणाओं ने इसके लक्ष्य को पूरा कर दिया है? इस विषय पर सोचने की फिर से जरुरत है।
1. कन्या-भ्रुण हत्या 2. कुछ वर्गोे में स्त्री शिक्षा आज भी नगण्य3. कम उम्र में विवाह 4. दहेज संबंधी प्रताड़ना और हत्याएं5. कामकाजी महिलाओं के साथ अनुचित व्यवहार 6. राजनीतिक अस्तित्व भी नगण्य 7. विधवाओं की दयनीय स्थिति 8. महिलाओं के साथ आपराधिक व्यवहार9. लड़कियों के साथ भेदभाव
ये समस्याएं आज भी मुंह बाये समाज के सामने खड़ी हैं। मात्र देश की 5 से 10 प्रतिशत प्रगतिशील महिलाएं बाकी 85 प्रतिशत महिलाओं का सही प्रतिनिधित्व नहीं कर रही है। हॉं अगर वे चाहें तो इस क्षेत्र में साथर्क पहल जरुर कर सकती है। समाज विकास की अवस्था से गुजरता हुआ आज इस स्थिति तक पहॅंुचा है। इसमें महिलाओं की वत्र्तमान स्थिति तक पहॅुंचा है। इसमें महिलाओं की वत्र्तमान स्थिति में अपने मुकाम हासिल करने के पीछे उनकी निरंतर संघर्ष करने की मानसिकता रही है। उसी सोच को बनाए रखने से ही आगे कुछ दशकों में हमारे देश में स्त्रियों की स्थिति में सुधार की संभावना है। देश के हर तबके में स्त्रियों को सही प्रतिनिधित्व और उचित मार्गदर्शन मिले तभी हमारा लक्ष्य कि स्त्रियां पुरुषों के समान खड़ी मिले, पूरा हो पाएगा। साथ ही लड़कियों में इतने आत्मबल की जरुरत है, जिससे वो अपने जीवन के लक्ष्य को पूरा करने में किसी विवशता के कारण कुंठित न रह जाए। बल्कि तमाम झंझावातों को सहते हुए उस लक्ष्य को पा सके।
शुक्रवार, 20 मार्च 2009
esttri
नारी ‘ाब्द के ढंाचे को कभी गौर से देखा है! ना और री, एक ऐसा ‘ाब्द बनाता है, जो कहीं से असामान्य तो नहीं लगता पर इसका सीधा मतलब हो जैसे समाज ने उसे ना, री!, कहना ‘ाुरु से ही कर दिया था। इसे पढ़ने पर ‘ाायद ही कोई नारी हेागी जो इस बात को गलत ना ठहरा दे। मेरी मंशा ना तो किसी के मन को ठेस पहुंचाने की है और ना ही यह सभी पर सच बैठती है। महिला दिवस सन 1911 से हर वर्ष अंतराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जा रहा है लेकिन छिटपुट तरक्कियों के अलावा मुझे तो कोई और उपलब्धि नहीं दिखती। नकारात्मक सोच का प्रमाण नहीं है यह, प्रत्यक्ष ना सही अप्रत्यक्ष मायने में तो स्पष्ट रुप से दिख रहा है। घर से निकल कर अपनी प्रतिभा का तो आवरण इसने खोल दिया और सफलता की उॅंचाइयों को भी छू रहीं हैं लेकिन स्त्री स्वंय एक ऐसा आवरण है जो अपने क्षमता से अधिक सबको ढकने को विवश है। वह इस आदत की मुरीद बनाई नहीं गई, उसके सॉंचें में ही ईश्वर ने रच डाला है। कभी-कभी कोफ्त होती है कि क्यों वह इतनी सहनशील है, क्यों आवरण बनकर हर किसी को ढकने को मजबूर है और सभी गुण रहने के बावजूद किसी और का अनुकरण करे? ये ऐसे सवाल हैं, जो तथाकथित संभ्रात और आधुनिक महिला से लेकर गॉंव का महिला के मन में उमड़ते हैं। आधुनिक स्त्री इसकी तह तक जाने का प्रयास करती है और गरीब स्त्री प्रश्न के मन में आते ही उसे अपनी अन्य इच्छाओं की तरह ही तोड़-मरोड़ कर अनंत में फेंक देती है, क्योंकि उसे अंदाजा है कि ऐसी बातों में वक्त बरबाद कर कुछ हासिल नहीे होने को है। विदेश की महिला को लोग काफी खुलंे विचारों की समझते हैं, उसकी सोच की परिधि का अंदाजा तो मुझे नहीं, मगर यहां की महिला की सोच का आकलन मैं अपने अनुभव से जहां तक लगा सकीं हूॅं , वो तो यही कहता है कि पढ़ी-लिखी महिला भी यहां आवरण का ही कर्तव्य निभा रही है। महिलाओं के अस्तित्व पर उठने वाले सवालों के घेरे में कहां तक उसका स्वरुप निखर कर सामने आया है, इसका जवाब तो अमुनन उनसे सही ‘ाायद ही कोई दे पाएगा। परिवार, रिश्ते-नाते कभी उसकी तरफ से बंधन नहीे माने गए बल्कि वह तो इनके लिए सब-कुछ न्योछावर करने को तैयार रही है, पर फिर भी ये सच है कि एक सवाल उसके मन में जरुर कौंधता है कि वह कितनी आजाद है! आजादी के मायने उसकी स्वछंदता से बिलकुल नहीं है, स्वछंदता दायरे तोड़ देती है, जो समाज में निंदनीय है। स्त्री को तो समाज का भी आवरण बनना है अतः वह अपने रिश्ते-नाते, काम-काज और सोच तक को सीमित रखती है। ऐसा भी है कि सीमाएं टूट रहीं हैं, कहीं-कहीं उसकी चरमराहट सुनाई भी दे जाती है। कुछ ऐसी महिलाएं हैं जिनमें इन सीमाओं और वर्जनाओं को तोड़ने की क्षमता है, पर इस सीमावदर्धन के लिए उन्हें कहीं-कहीं एक-से-एक उपनाम दिए जा रहें हैं। ये तो उनकी कहानी हुई जो संघर्ष कर रहीं हैं पर उनका क्या जो ये दुस्साहस नहीं कर सकतीं। इसी आधी आबादी कहलाने वाली स्त्री ने बाकी आधी आबादी को जन्म दिया है, पाला है और सहेज कर रखा है मगर उसकी ही इस स्थिति का जिम्मेवार आखिर कौन है! संतोष और संतुलन बना कर समाज का निमार्ण करने वाली नारी ही है। जन्म लेने के बाद वह इन दोनों के साथ समझौता कर जीना सीख जाती है। संभव है कि यह कुछ खास महिलाओं पर सटीक नहीं बैठती पर देश की अधिकांश स्त्रियों की यही स्थिति है। प्रयास तो जारी हैं, काफी हद तक सफलता भी मिली है मगर समाज के बाहय स्वरुप में वह जगमगाने के बावजूद अपने अंर्तद्वंद से जूझ रही है। एक सफल और सुगढ़ नारी की पहचान अधिकंाश मायनों में यही है कि वह कितनी सहनशील, त्यागशील, गुणी और संतोषी है। आजकल अजीब-सा समीकरण प्रचलित है, वह सभी मूल्यों पर हर जगह खरी उतरे, उसमें कोई कमी ना रहे। अभी हाल में, नोएडा में एक लड़की के एम.एम.एस की घटना पर एक परिचिता का यह बयान कि, “उसे हिम्मत नहीं हारना चाहिए, डटकर मुकाबला करना चाहिए, वरना वह कमजोर समझी जाएगी“ मन को यह सोचने को विवश करता है कि स्त्रियों की सोच में बदलाव तो आएं हीं हैं, जिसमें दम है। पर एक आधुनिका का यह बयान कितनी लड़कियों को हिम्मत देगा! चलो डूबते को तिनके का सहारा ही सही। मगर भारत की हर वर्ग की स्त्रियों को संबल कौन देगा! कई तो खुद इसके लिए क्षमतावान हैं और यह भी एक सच है कि कई ऐसी भी हैं, जो इससे अछूती हैं, जो आज भी आगे बढ़ने से कतरा रहीं हैं। उसे प्रतिनिधि की जरुरत है क्योंकि वह इसी की आदी है। असुरक्षा, असभ्यता और अत्याचार के झंझावातों से वह आज भी जूझ रही है, उसे तलाश है ऐसे अवसर कि जब वह किसी पर आश्रित हुए बिना अपनी आवश्यकताएं पूरी कर सके, पर क्षितिज तक पहंुचने में काफी वक्त लगेगा। वह परिवार की बलि नहीं चढ़ा सकती, सीमाएं नहीं तोड़ सकती, संस्कार नहीं छोड़ सकती जैसे तमाम मूल्य उसपर लाद दिए गए हैं, जिसका परिणाम यह आ रहा है वह अपनी सोच नहीें छोड़ सकती ,जिसका परिणाम यह आ रहा है कि वह अपनी सोच नहीं रख सकती। आज प्रयास तो जारी हैं, मगर गौर करने की बात यह है कि यह प्रयास कब तक सफल होगा! कब उसके मन का अंर्तद्वंद ‘ाांत होगा और कब वह समाज का आवरण नहीं बल्कि अपने विचार को अमल में लाने की अधिकारिणी बनेगी!
शुक्रवार, 6 मार्च 2009
दिल्ली में बढती आत्महत्या की घटनाएं
दिल्ली और आस-पास के इलाकेां से हमें करीबन रोज ही आत्महत्या से जुड.ी खबरें मिल रहीं हैं। इसके पीछे किसी के नीजि कारण रहते हैं या कोइ्र्र अन्य कारण से अपनी जान दे रहा है। इन खबरों ने यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि आज इंसान के जीवन में आखिर किन परिस्थितियों ने जन्म ले लिया है कि दिन-ब-दिन ऐसी घटनाएं आम होंती जा रहीं हैं। साथ ही उनकी सहनशक्ति किन कारणों से इतनी कमजोर हो गई। आम तौर पर इन घटनाओं का कारण पारिवारिक ही रहता है। कई बार कुछ बाहरी कारण भी उन पर दबाव की वजह बनते हैं। गौर करने की बात यह है कि पारिवारिक वजह आखिर कैसे उस पर इतना हावी हो जातीं हैं कि वह अपने अजीज से ही दूर जाना चाहे। परिवार को इंसान का सशक्त पहलू माना जाता है, जो उसके जीवन का आधार बनता है, साथ की जीने की वजह भी। उसके रोजमर्रा की जिंदगी परिवार के इर्द-गिर्द ही झूमती रहती है। यह आदत ही उन सभी की जिंदगी का ताना-बाना बुनती है। लोगों में बड.ती आत्महत्या की प्रवतिृ उनकी सहनशक्ति पर सवालिया निशान लगाती है। मगर इस वक्त उस व्यक्ति विशेष के साथ परिवार की क्या भूमिका निर्धारित होती है, यह कभी स्पष्ट नहीं होती है। मात्र समस्या को सार्वजनिक कर देना ही उसका समाधान नहीं होता। साथ ही इसका दूसरा पहलू जो विचारणीय है, उस परिवार के जिंदगी भर का दर्द। कहा जाता है कि जाने वाला चला जाता है, असली जिंदगी उसके बाद के लोगों की होती है। मुख्य बात यह है कि एक उचित संवाद का अभाव आज कहीं-न-कहीं लोगों के रिश्तों में सेंध लग रहा हैै इंसान की व्यावसिक जिंदगी के साथ-साथ आज उसकी नीजि जिंदगी मे मोल-भाव के नियम लागू होने लगे हैं। अपने माता-पिता, भाई-बहनों के साथ एक बच्चा क्योंकर गहरे रिश्ते कायम नहीं कर पाता, इसका जिम्मेवार आखिर कौन है? एक बच्चा समाज में सबसे पहले परिवार में सीखना ‘ाुरु करता है मगर उम्र बड.ने के साथ-साथ एक समय उनकी बातें, सीख सब बेमानी लगने लगती है। किशोरावस्था तक आते-आते बच्चों का मन-मस्तिष्क कल्पना की उड.ान भरने लगता है और यदि इसी क्रम में कभी-कभी उनके परिजन उन्हें वास्तविकता की दूनिया में लाने का प्रयत्न करते हैं तो उन्हें यह नागवार गुजरता है। खैर इन घटनाओं की वजहें कुछ भीं हों, पर ध्यान देने वाली बात है कि ऐसी घटनाएं कब तक कम होंगीं। हमारे देश में ऐसी स्थितियों के बड.ने की वजह से कहीं-न-कहीं असंतोष की स्थिति में वदिृ होती जा रही हैं। संभवतः किसी के निजी ह्रास से दूसरे लोग कम ही प्रभावित हो रहीं हैं। फिर भी समाज में एक स्वस्थ मानसिकता के विकास के लिए ऐसी नकारात्मक स्थितियों पर विजय पाना होगा। इसके लिए समाज के सभी वर्गों को इस मार्ग पर कदम बड.ाना होगा। साथ ही अपनी समस्याओं को लेकर कुंठित होते युवाओं की मानसिकता जड.ता समाप्त करने के लिए समाज के साथ-साथ उनके परिजनों की भी भूमिका कहीं अधिक बड. जाती है। इसके निदान हेतु मनोवैज्ञानिक विश्लेषकों के भी अहम योगदान की आवश्यकता है।
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