gगिनती जो थमती नहीं, सच्चाई जो छिपती नहीं
भारत की नारी की दशा और दिशा को स्पष्ट करने का प्रयास आज भी हमारे समाज में जारी है। भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में नारी ‘ाब्द को आज दो भिन्न अर्थों में देखा जाने लगा है, एक अर्थ समाज के सामने प्रत्यक्ष है, यह सकारात्मक मायने में प्रयोग होता है, जाहिर है अच्छी बातें सभी पसंद करते हैं। वहीे दूसरा अर्थ न जाने क्यों अप्रत्यक्ष होते हुए भी जगजाहिर हो ही जाता हैं। प्रगतिशील नारी, सुनने में कितना अच्छा लगता है, एक ऐसे वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही है, जिसे पौरुष मानसिकता के तले दबाए जाने का हरसंभव प्रयास अभी तक जारी है। सभ्य समाज की मुरीद कुछ परिवार आज भी लड़कियों को प्रगतिशील और आधुनिक बनाने में मदद करने का दावा करते हैं, मगर वास्तविकता की भी झलक मिल रही है। नारी सशक्तिकरण का पलड़ा कितना भारी है, इसकी वास्तविकता से कोई ‘ाायद ही अंजान हो। देश में प्रगतिशील महिलाओं की गिनती भी कोई कम नहीं है। जब से स्त्रियों ने अपनी पहचान बनानी ‘ाुरु की, आज से इक्का-दुक्का से बढ़कर निश्चित रुप से सैकड़ों मंे पंहुच गई है। प्रख्यात महिलाएं, जिन्होनें देश में चिभिन्न क्षेत्रों के उच्चस्थ पदों पर पदास्थापित होकर लोकप्रियता हासिल कीें है, वो देश की राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर एक कम उम्र की अभिनेत्री और ऐसे ही असंख्य क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है। यहां तक कि भारत सरकार ने सन्् 2001 को नारी सशक्तिकरण वर्ष मनाए जाने की घोषणा कर डाली, और कहा गया कि- देश के नई शताब्दी में प्रवेश करने हुए हमारा लक्ष्य देश में नारियों को पुरुषों के समान स्थान देने का है। उस वर्ष कई परियोजनाएं लागू की गईं, कुछ महिलाओं को इससे लाभ भी मिला जैसे्’ स्वशक्ति और स्त्री -शक्ति और लघु इकाई के कार्यक्रम स्वयं्िसद्दा‘ की मदद से 100,000 महिलाओं को लाभ पहुंचााने वाले कार्यक्रम। इसके अतिरिक्त बालिकाओं के लिए बालिका सम्ृद्दि योजना‘ घोष्णा कर देना या उसके पहले और बाद किए गए घेाषणाओं ने इसके लक्ष्य को पूरा कर दिया है? इस विषय पर सोचने की फिर से जरुरत है।
1. कन्या-भ्रुण हत्या 2. कुछ वर्गोे में स्त्री शिक्षा आज भी नगण्य3. कम उम्र में विवाह 4. दहेज संबंधी प्रताड़ना और हत्याएं5. कामकाजी महिलाओं के साथ अनुचित व्यवहार 6. राजनीतिक अस्तित्व भी नगण्य 7. विधवाओं की दयनीय स्थिति 8. महिलाओं के साथ आपराधिक व्यवहार9. लड़कियों के साथ भेदभाव
ये समस्याएं आज भी मुंह बाये समाज के सामने खड़ी हैं। मात्र देश की 5 से 10 प्रतिशत प्रगतिशील महिलाएं बाकी 85 प्रतिशत महिलाओं का सही प्रतिनिधित्व नहीं कर रही है। हॉं अगर वे चाहें तो इस क्षेत्र में साथर्क पहल जरुर कर सकती है। समाज विकास की अवस्था से गुजरता हुआ आज इस स्थिति तक पहॅंुचा है। इसमें महिलाओं की वत्र्तमान स्थिति तक पहॅुंचा है। इसमें महिलाओं की वत्र्तमान स्थिति में अपने मुकाम हासिल करने के पीछे उनकी निरंतर संघर्ष करने की मानसिकता रही है। उसी सोच को बनाए रखने से ही आगे कुछ दशकों में हमारे देश में स्त्रियों की स्थिति में सुधार की संभावना है। देश के हर तबके में स्त्रियों को सही प्रतिनिधित्व और उचित मार्गदर्शन मिले तभी हमारा लक्ष्य कि स्त्रियां पुरुषों के समान खड़ी मिले, पूरा हो पाएगा। साथ ही लड़कियों में इतने आत्मबल की जरुरत है, जिससे वो अपने जीवन के लक्ष्य को पूरा करने में किसी विवशता के कारण कुंठित न रह जाए। बल्कि तमाम झंझावातों को सहते हुए उस लक्ष्य को पा सके।
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