शुक्रवार, 6 मार्च 2009

दिल्ली में बढती आत्महत्या की घटनाएं


दिल्ली और आस-पास के इलाकेां से हमें करीबन रोज ही आत्महत्या से जुड.ी खबरें मिल रहीं हैं। इसके पीछे किसी के नीजि कारण रहते हैं या कोइ्र्र अन्य कारण से अपनी जान दे रहा है। इन खबरों ने यह सोचने को मजबूर कर दिया है कि आज इंसान के जीवन में आखिर किन परिस्थितियों ने जन्म ले लिया है कि दिन-ब-दिन ऐसी घटनाएं आम होंती जा रहीं हैं। साथ ही उनकी सहनशक्ति किन कारणों से इतनी कमजोर हो गई। आम तौर पर इन घटनाओं का कारण पारिवारिक ही रहता है। कई बार कुछ बाहरी कारण भी उन पर दबाव की वजह बनते हैं। गौर करने की बात यह है कि पारिवारिक वजह आखिर कैसे उस पर इतना हावी हो जातीं हैं कि वह अपने अजीज से ही दूर जाना चाहे। परिवार को इंसान का सशक्त पहलू माना जाता है, जो उसके जीवन का आधार बनता है, साथ की जीने की वजह भी। उसके रोजमर्रा की जिंदगी परिवार के इर्द-गिर्द ही झूमती रहती है। यह आदत ही उन सभी की जिंदगी का ताना-बाना बुनती है। लोगों में बड.ती आत्महत्या की प्रवतिृ उनकी सहनशक्ति पर सवालिया निशान लगाती है। मगर इस वक्त उस व्यक्ति विशेष के साथ परिवार की क्या भूमिका निर्धारित होती है, यह कभी स्पष्ट नहीं होती है। मात्र समस्या को सार्वजनिक कर देना ही उसका समाधान नहीं होता। साथ ही इसका दूसरा पहलू जो विचारणीय है, उस परिवार के जिंदगी भर का दर्द। कहा जाता है कि जाने वाला चला जाता है, असली जिंदगी उसके बाद के लोगों की होती है। मुख्य बात यह है कि एक उचित संवाद का अभाव आज कहीं-न-कहीं लोगों के रिश्तों में सेंध लग रहा हैै इंसान की व्यावसिक जिंदगी के साथ-साथ आज उसकी नीजि जिंदगी मे मोल-भाव के नियम लागू होने लगे हैं। अपने माता-पिता, भाई-बहनों के साथ एक बच्चा क्योंकर गहरे रिश्ते कायम नहीं कर पाता, इसका जिम्मेवार आखिर कौन है? एक बच्चा समाज में सबसे पहले परिवार में सीखना ‘ाुरु करता है मगर उम्र बड.ने के साथ-साथ एक समय उनकी बातें, सीख सब बेमानी लगने लगती है। किशोरावस्था तक आते-आते बच्चों का मन-मस्तिष्क कल्पना की उड.ान भरने लगता है और यदि इसी क्रम में कभी-कभी उनके परिजन उन्हें वास्तविकता की दूनिया में लाने का प्रयत्न करते हैं तो उन्हें यह नागवार गुजरता है। खैर इन घटनाओं की वजहें कुछ भीं हों, पर ध्यान देने वाली बात है कि ऐसी घटनाएं कब तक कम होंगीं। हमारे देश में ऐसी स्थितियों के बड.ने की वजह से कहीं-न-कहीं असंतोष की स्थिति में वदिृ होती जा रही हैं। संभवतः किसी के निजी ह्रास से दूसरे लोग कम ही प्रभावित हो रहीं हैं। फिर भी समाज में एक स्वस्थ मानसिकता के विकास के लिए ऐसी नकारात्मक स्थितियों पर विजय पाना होगा। इसके लिए समाज के सभी वर्गों को इस मार्ग पर कदम बड.ाना होगा। साथ ही अपनी समस्याओं को लेकर कुंठित होते युवाओं की मानसिकता जड.ता समाप्त करने के लिए समाज के साथ-साथ उनके परिजनों की भी भूमिका कहीं अधिक बड. जाती है। इसके निदान हेतु मनोवैज्ञानिक विश्लेषकों के भी अहम योगदान की आवश्यकता है।

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