शुक्रवार, 20 मार्च 2009
esttri
नारी ‘ाब्द के ढंाचे को कभी गौर से देखा है! ना और री, एक ऐसा ‘ाब्द बनाता है, जो कहीं से असामान्य तो नहीं लगता पर इसका सीधा मतलब हो जैसे समाज ने उसे ना, री!, कहना ‘ाुरु से ही कर दिया था। इसे पढ़ने पर ‘ाायद ही कोई नारी हेागी जो इस बात को गलत ना ठहरा दे। मेरी मंशा ना तो किसी के मन को ठेस पहुंचाने की है और ना ही यह सभी पर सच बैठती है। महिला दिवस सन 1911 से हर वर्ष अंतराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जा रहा है लेकिन छिटपुट तरक्कियों के अलावा मुझे तो कोई और उपलब्धि नहीं दिखती। नकारात्मक सोच का प्रमाण नहीं है यह, प्रत्यक्ष ना सही अप्रत्यक्ष मायने में तो स्पष्ट रुप से दिख रहा है। घर से निकल कर अपनी प्रतिभा का तो आवरण इसने खोल दिया और सफलता की उॅंचाइयों को भी छू रहीं हैं लेकिन स्त्री स्वंय एक ऐसा आवरण है जो अपने क्षमता से अधिक सबको ढकने को विवश है। वह इस आदत की मुरीद बनाई नहीं गई, उसके सॉंचें में ही ईश्वर ने रच डाला है। कभी-कभी कोफ्त होती है कि क्यों वह इतनी सहनशील है, क्यों आवरण बनकर हर किसी को ढकने को मजबूर है और सभी गुण रहने के बावजूद किसी और का अनुकरण करे? ये ऐसे सवाल हैं, जो तथाकथित संभ्रात और आधुनिक महिला से लेकर गॉंव का महिला के मन में उमड़ते हैं। आधुनिक स्त्री इसकी तह तक जाने का प्रयास करती है और गरीब स्त्री प्रश्न के मन में आते ही उसे अपनी अन्य इच्छाओं की तरह ही तोड़-मरोड़ कर अनंत में फेंक देती है, क्योंकि उसे अंदाजा है कि ऐसी बातों में वक्त बरबाद कर कुछ हासिल नहीे होने को है। विदेश की महिला को लोग काफी खुलंे विचारों की समझते हैं, उसकी सोच की परिधि का अंदाजा तो मुझे नहीं, मगर यहां की महिला की सोच का आकलन मैं अपने अनुभव से जहां तक लगा सकीं हूॅं , वो तो यही कहता है कि पढ़ी-लिखी महिला भी यहां आवरण का ही कर्तव्य निभा रही है। महिलाओं के अस्तित्व पर उठने वाले सवालों के घेरे में कहां तक उसका स्वरुप निखर कर सामने आया है, इसका जवाब तो अमुनन उनसे सही ‘ाायद ही कोई दे पाएगा। परिवार, रिश्ते-नाते कभी उसकी तरफ से बंधन नहीे माने गए बल्कि वह तो इनके लिए सब-कुछ न्योछावर करने को तैयार रही है, पर फिर भी ये सच है कि एक सवाल उसके मन में जरुर कौंधता है कि वह कितनी आजाद है! आजादी के मायने उसकी स्वछंदता से बिलकुल नहीं है, स्वछंदता दायरे तोड़ देती है, जो समाज में निंदनीय है। स्त्री को तो समाज का भी आवरण बनना है अतः वह अपने रिश्ते-नाते, काम-काज और सोच तक को सीमित रखती है। ऐसा भी है कि सीमाएं टूट रहीं हैं, कहीं-कहीं उसकी चरमराहट सुनाई भी दे जाती है। कुछ ऐसी महिलाएं हैं जिनमें इन सीमाओं और वर्जनाओं को तोड़ने की क्षमता है, पर इस सीमावदर्धन के लिए उन्हें कहीं-कहीं एक-से-एक उपनाम दिए जा रहें हैं। ये तो उनकी कहानी हुई जो संघर्ष कर रहीं हैं पर उनका क्या जो ये दुस्साहस नहीं कर सकतीं। इसी आधी आबादी कहलाने वाली स्त्री ने बाकी आधी आबादी को जन्म दिया है, पाला है और सहेज कर रखा है मगर उसकी ही इस स्थिति का जिम्मेवार आखिर कौन है! संतोष और संतुलन बना कर समाज का निमार्ण करने वाली नारी ही है। जन्म लेने के बाद वह इन दोनों के साथ समझौता कर जीना सीख जाती है। संभव है कि यह कुछ खास महिलाओं पर सटीक नहीं बैठती पर देश की अधिकांश स्त्रियों की यही स्थिति है। प्रयास तो जारी हैं, काफी हद तक सफलता भी मिली है मगर समाज के बाहय स्वरुप में वह जगमगाने के बावजूद अपने अंर्तद्वंद से जूझ रही है। एक सफल और सुगढ़ नारी की पहचान अधिकंाश मायनों में यही है कि वह कितनी सहनशील, त्यागशील, गुणी और संतोषी है। आजकल अजीब-सा समीकरण प्रचलित है, वह सभी मूल्यों पर हर जगह खरी उतरे, उसमें कोई कमी ना रहे। अभी हाल में, नोएडा में एक लड़की के एम.एम.एस की घटना पर एक परिचिता का यह बयान कि, “उसे हिम्मत नहीं हारना चाहिए, डटकर मुकाबला करना चाहिए, वरना वह कमजोर समझी जाएगी“ मन को यह सोचने को विवश करता है कि स्त्रियों की सोच में बदलाव तो आएं हीं हैं, जिसमें दम है। पर एक आधुनिका का यह बयान कितनी लड़कियों को हिम्मत देगा! चलो डूबते को तिनके का सहारा ही सही। मगर भारत की हर वर्ग की स्त्रियों को संबल कौन देगा! कई तो खुद इसके लिए क्षमतावान हैं और यह भी एक सच है कि कई ऐसी भी हैं, जो इससे अछूती हैं, जो आज भी आगे बढ़ने से कतरा रहीं हैं। उसे प्रतिनिधि की जरुरत है क्योंकि वह इसी की आदी है। असुरक्षा, असभ्यता और अत्याचार के झंझावातों से वह आज भी जूझ रही है, उसे तलाश है ऐसे अवसर कि जब वह किसी पर आश्रित हुए बिना अपनी आवश्यकताएं पूरी कर सके, पर क्षितिज तक पहंुचने में काफी वक्त लगेगा। वह परिवार की बलि नहीं चढ़ा सकती, सीमाएं नहीं तोड़ सकती, संस्कार नहीं छोड़ सकती जैसे तमाम मूल्य उसपर लाद दिए गए हैं, जिसका परिणाम यह आ रहा है वह अपनी सोच नहीें छोड़ सकती ,जिसका परिणाम यह आ रहा है कि वह अपनी सोच नहीं रख सकती। आज प्रयास तो जारी हैं, मगर गौर करने की बात यह है कि यह प्रयास कब तक सफल होगा! कब उसके मन का अंर्तद्वंद ‘ाांत होगा और कब वह समाज का आवरण नहीं बल्कि अपने विचार को अमल में लाने की अधिकारिणी बनेगी!
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