गुरुवार, 26 मार्च 2009

सूरजकुंड मेला : हस्तशिल्पियों के १५ दिनों का आशियाना

“ हम तो यहां 22-23 साल से आ रहें हैं। हमारा स्वंय सहायता समूह चलता है। इस समूह के लोग इस कार्य में लगे हैं। ये कला हमारी विरासत है। ” हरियाणा के भवणा गॉंव से आई फूलवंती मेले में काफी वर्षों से शिरकत करती आ रहीं हैं। वो अपने अनुभव बताते हुए कहतीं हैंः- ” इस मेले के आयोजक हम सबको काफी सुविधाएं मुहैय्या कराते हैं। हमारे रहने, खाने-पीने का पूरा प्रबंध सरकार करती है। स्थानीय भाषा में हमारी इस कला को टेरा-कोटा का सामान कहा जाता हैै। इसे हम अलग-अलग मिट्टी की किस्मों से बनाते हैं। इसके लिए 3-4 प्रकार जैसे काली, लाल और मुल्तानी मिट्टी को अच्छी तरह मिला कर बड़ी सी भट्टी में पकाया जाता है, उसके बाद उसे आॅयल पेंट से रंगा जाता है। ” हमारे सामने एक से एक खुबसूरत फ्लॉवर पॉट, पेन स्टैंड और अन्य सजाने योग्य वस्तुओं का भंडार लगा हुआ था। उनसे इन वस्तुओं से होने वाली कमाई के बारे में पूछने पर पता चला कि 200 रुपयों से शुरु होकर करीब 8000 रुपयों की कमाई उनकी हो जाती है। इन शिल्पों को देखकर इस के लिए काम करने वाले लोगों की कार्यकुशलता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। सूरजकुंड मेले में इस वर्ष मध्यप्रदेश को आधार राज्य विशेष बनाया गया था, इस कारण पूरे मेले में इसकी स्पष्ट छाप दिखाई पड़ती थी। मेले को यदि गौर से देखा जाए तो इसमें हस्तशिल्पियों की भरमार थी। कहीं लकड़ी पर अदभुत कारीगरी थी, तो कहीं मेटल पर हाथ की सफाई स्पष्ट झलकती थी। इसी समय हमारी नजर एक स्टॅाल पर पड़ी, जहां स्लेटी रंग लिए आर्कषक सजावटी सामान बिक रहे थे। पूछने पर उन्होनें बताया कि वो ग्वालियर, मध्यप्रदेश के हैं और इस मेले में चार बार ‘ाामिल हो चुके हैं। आगे उन्होनें बताया कि इस काम में उनके साथ आठ लोग सहायता करते हैं, जिनमें चार लोग उनके परिवार के ही ‘ाामिल है। रद्दी अखबारों और कागजों की लुग्दी बनाकर उसे फेविकोल की सहायता से चीनी मिðी और मुल्तानी मिðी के मिश्रित ढंाचे, जिसे डाई कहा जाता है, उसपर ढालते हैं और फिर पकाते हैं। पकने के बाद हमारे सामने ये खुबसूरत चीजें निखर कर सामने आ पाती हैं। मेले में आने के करीब चार-पॉंच महीने पहले ही ये लोग इन चीजों को बनाने में लग जाते हैं और मेले 50 रुपए से लेकर 10,000 रुपए तक की कमाई हो जाती है। इन्होनें बताया कि वे पहले दिए आॅर्डर पर भी सामान बनाकर लाते हैं। आमतौर पर इन बहुमुल्य सामाग्रियों की सही कीमत नहीं मिल पाती। इस कारण यह मेला निश्चित रुप से उन्हें एक बड़ा बाजार देता है, जहां देश-विदेश से आए सैलानी इनकी मेहनत को सही ढंग से आॅंकते हैं और मुॅंहमंागे दाम पर खरीदने को तैयार रहते हैं। हस्तशिल्प उद्योग को साथर्क रुप से बढ़ावा देने में इस मेले का निश्चित रुप से योगदान है। हस्तशिल्प वस्तुओं की कड़ी में ही आगे आकर्षक ऊनी दरियों की स्टॉल दिखी, जिसे जबलपुर, मध्यप्रदेश के एक गॉंव से मोहम्मद ‘ामीम ने खोल रखा था। उन्होनें हमें बताया कि करीब 5 वर्षों से वो यहां आ रहे हैं। हाथ से बनाई गई दरियों के बारे में उनका कहना था कि वो इसे तानी की सहायता से बनाते हैं। करीब दो-ढ़ाई लाख का इस्टीमेट लेकर वो यहां आते हैं, लौटने पर उन्हे एक-डेढ़ लाख की कीमत मिल ही जाती है। 3000 से ‘ाुरु हुई दरियों की कीमत 10,000 रुपए तक भी होती है। इस वर्ष मेले में हस्तशिल्प वस्तुओं के स्टालों में लकड़ी, मिटटी से बनी चीजें बड़े ही खुबसूरत ढंग से बनाई गई थी। किसी स्टॉल पर कागज पर डिजाइन कर उसे लकड़ी पर अपने हाथों की कार्यकुशलता से भगवान गणेश, और मॉं दुर्गा आदि की छोटी-बड़ी मुर्तियां बनाकर आर्कषक रंगों से रंगा जा रहा था। मेले को घूमने के बाद ऐसा लग रहा था जैसे स्टालों में रखी चीजें कोई भी पहले से बनी हुई नहीं बल्कि जीवंत हों। कारीगर उन्हें बनाने में मशगुल थे। उनकी योग्यता, लगन, परिश्रम और कार्यक्षमता का ही परिणाम था कि आप जिधर नजरें घुमाएं आपको इंसान के हुनर की खुबसूरती का सच्चा प्रमाण मिलता है। वर्षों से सहेजी गई इस कला को उसकी सही कीमत दिलाने के लिए भारत सरकार और हरियाणा सरकार के संयुक्त प्रयास से इस सूरजकुंड मेले का आयोजन, इन हस्तशिल्पियों के अनुसार, निश्चित रुप से प्रशंसनीय और सराहनीय है।

कोई टिप्पणी नहीं: